नई दिल्ली। भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के पास आज भले ही अपार शोहरत, करोड़ों की संपत्ति, दर्जनों बल्ले और शानदार किट हो लेकिन एक वक्त ऐसा भी था जब वह बड़ी बहन जयंती द्वारा बनाई गई चाउमीन को टिफिन में भरकर उधार की किट के साथ अभ्यास करने के लिए जाते थे।
खेल पत्रकार सी. राजशेखर राव द्वारा लिखित और 'ओशन पेपरबैक्स' द्वारा प्रकाशित 134 पृष्ठ की पुस्तक 'धौनी' ने भारतीय कप्तान के इस रोचक सफरनामे का खुलासा किया है। इस पुस्तक के माध्यम से राव ने खिलाड़ी, कप्तान और एक व्यक्ति के रूप में धोनी के जमीन से आसमान तक के सफर पर प्रकाश डाला है।
महंगी किट खरीदना संभव नहीं था राव लिखते हैं कि धौनी के पिता पान सिंह मेकॉन कंपनी में दैनिक भत्ते पर काम किया करते थे। बाद में उन्हें पंप ऑपरेटर के तौर पर स्थाई नौकरी मिल गई लेकिन उस नौकरी के बदले मिलने वाले वेतन से धोनी के लिए महंगी क्रिकेट किट नहीं खरीदी जा सकती थी। यही कारण है कि धौनी अपने दोस्तों से किट उधार लेकर अभ्यास के लिए जाते थे।
गरीबी धौनी के राह में कभी भी रोड़ा नहीं बनी। यह कारण था कि उन्होंने पहले ही ठान लिया था कि उन्हें क्रिकेट में ही करियर बनाना है और इसे लेकर वह हमेशा सकारात्मक सोचा करते थे। शुरुआती दिनों में उनकी जिंदगी में कई मुश्किलें आईं लेकिन उन्हें उन्होंने हंसते-हंसते पार कर लिया।
हर मौके को भुनाना जानते हैं धोनी धोनी की सबसे बड़ी खासियत थी कि वह अपनी राह में आने वाले हर एक मौके को भुनाना जानते थे। इसी विलक्षण गुण ने उन्हें आज इतना ऊपर पहुंचा दिया है। हमें देखने में भले ही लगता है, लेकिन भारतीय टीम का कप्तान बनने तक का उनका सफर कतई आसान नहीं रहा है।
धौनी को फुटबाल के गोलकीपर से क्रिकेट का विकेटकीपर बनाने वाले प्रशिक्षक केशब रंजन बनर्जी कहते हैं कि 1995 में धौनी आठवीं कक्षा में पढ़ते थे। वैसे तो वह एक विकेटकीपर थे लेकिन एक मैच के दौरान उन्हें बल्लेबाजी का मौका मिल गया। उन्हें 5-10 गेंदों का सामना करना था। उनसे अपेक्षा की जा रही थी कि वह इतनी गेंदों पर 15-20 रन जुटा लेंगे लेकिन धौनी ने 23 रन जुटाकर अपने साथियों को खुश कर दिया।
बल्लेबाजी से धौनी का यह पहला परिचय था। बतौर बल्लेबाज अब उनके अंदर का आत्मविश्वास जाग रहा था। कक्षा 10 में उन्हें एक स्कूली मैच में पारी शुरू करने के लिए भेजा गया। उन्होंने 150 गेंदों पर 23 चौकों और छह छक्कों की मदद से 213 रनों की बेहतरीन पारी खेलकर सबका दिल जीत लिया। इस दौरान उन्होंने अपने साथी बल्लेबाज शब्बीर हुसैन के साथ 40 ओवरों के मैच में 378 रनों की साझेदारी निभाई। शब्बीर ने 116 गेंदों पर 117 रन बनाए।
आज भी याद है वो पारी उस पल को याद करते हुए बनर्जी कहते हैं, "हम 1996 से 2000 तक लगातार चैम्पियन रहे लेकिन 1999 का फाइनल हम कभी नहीं भूल सकते। धोनी और शब्बीर ने क्या गजब की पारी खेली थी। आप सहज ही इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं कि उस समय मैदान में क्या हो रहा होगा, जब दोनों बल्लेबाजों ने 40 ओवर के मैच में पहले विकेट के लिए 378 रन जोड़ दिए थे।"
धौनी मेकॉन कालोनी में पले-बढ़े। एक क्रिकेट खिलाड़ी के तौर पर उनकी पहचान बनने लगी थी लेकिन दुख की बात यह थी कि उन्हें मेकॉन की टीम में जगह नहीं मिली। चयनकर्ता अमित मिश्रा ने कहा था कि धौनी की उम्र काफी कम है और टीम में जगह पाने के लिए उन्हें इंतजार करना होगा।
धौनी इससे निराश नहीं हुए और स्कूल में रहते हुए ही उन्होंने 1998 में सेंट्रल कोलफील्ड लिमिटेड (सीसीएल) टीम में जगह बना ली। इसके बदले उन्हें 2000 रुपये प्रतिमाह का स्टाइपेंड मिला करता था। धौनी सीसीएल के मैच खेला करते थे। जल्द ही धौनी की बोर्ड की परीक्षाएं आ गई और यही वक्त फैसला करने का था। धौनी ने अपने मन की सुनते हुए क्रिकेट को वरीयता देने का फैसला किया।
आत्मविश्वास सबसे बड़ी कुंजी बतौर खिलाड़ी धोनी के संघर्ष के गवाह रहे उनके प्रशिक्षक, दोस्त और मेकॉन के खिलाड़ी जितेंद्र कुमार सिंह का मानना है कि आत्मविश्वास धोनी की सबसे बड़ी पूंजी थी। धौनी के नाम पर मंदिर बनवाने को लेकर खबरों में आए जितेंद्र कहते हैं, "उनके अंदर आत्मविश्वास कूट-कूट कर भरा था। साथ ही उनकी बल्लेबाजी तकनीक दूसरों से भिन्न और ठोस थी। यह जानते हुए भी धौनी खूब मेहनत किया करते थे। मुझे याद है कि वह मुझे सुबह चार बजे उठाकर कहा करते थे 'जीतू भैया..खेलने चलिए।' मेकॉन के लिए खेलने के दौरान जब मैं अभ्यास सत्र के दौरान दिन में चार मैच आयोजित कराता था, तब वह चारों मैचों में खेला करते थे। वह 200 लड़कों में सबसे अलग दिखा करते थे।"
जितेंद्र कहते हैं कि उन्हें यह देखकर बहुत दुख होता था कि प्रतिभा का धनी होने के बावजूद धौनी बिना किट और अच्छे जूतों के लिए अभ्यास के लिए आते थे। जितेंद्र कहते हैं, "मैं वह दिन नहीं भूल सकता। आज धौनी के पास सबकुछ है। निश्चित तौर पर वह भी उन दिनों को नहीं भूले होंगे। मैं उनसे बेहद प्रभावित था। अगर मैं उनसे छोटा होता तो निश्चित तौर पर वह मेरे प्रेरणास्रोत होते। मेरी नजर में धौनी उस क्रिकेटर का नाम है, जो दिल से ईमानदार और सीधा-साधा है और जिसने कभी भी खुद को किसी अन्य से दोयम नहीं समझा। इसी गुण ने धौनी को जमीन से आसमान तक पहुंचा दिया है।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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